भगवान श्री गणेश हिंदू धर्म के सबसे लोकप्रिय और पूजनीय देवताओं में से एक हैं। उन्हें विघ्नहर्ता कहा जाता है क्योंकि वे भक्तों के जीवन से सभी बाधाओं और कठिनाइयों को दूर करते हैं। भगवान गणेश बुद्धि, ज्ञान, सफलता और शुभता के प्रतीक माने जाते हैं। किसी भी शुभ कार्य, पूजा-पाठ, विवाह, गृह प्रवेश या नए कार्य की शुरुआत से पहले सबसे पहले गणेश जी की पूजा की जाती है, इसलिए उन्हें प्रथम पूज्य देव भी कहा जाता है। गणेश जी का स्वरूप अत्यंत विशेष है, उनका सिर हाथी का है जो बुद्धिमत्ता और समझ का प्रतीक है, जबकि उनका बड़ा पेट जीवन के सुख-दुख को सहन करने की क्षमता दर्शाता है। उनके बड़े कान यह सिखाते हैं कि हमें हमेशा ध्यान से सुनना चाहिए और अच्छी बातों को ग्रहण करना चाहिए। गणेश जी का वाहन मूषक है, जो यह दर्शाता है कि वे छोटे से छोटे संकट पर भी नियंत्रण रखते हैं। उन्हें मोदक और लड्डू बहुत प्रिय हैं। गणेश चतुर्थी का त्योहार उनके जन्मोत्सव के रूप में पूरे भारत में बहुत धूमधाम और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। भगवान गणेश हमें यह प्रेरणा देते हैं कि धैर्य, मेहनत और बुद्धि के साथ हम हर समस्या का समाधान कर सकते हैं और जीवन में सफलता प्राप्त कर सकते हैं।
Ganesh bhgwan
श्री गणेश चालीसा (Shri Ganesh Chalisa) एक पवित्र Hindu devotional स्तोत्र है, जिसमें भगवान श्री गणेश की महिमा, बुद्धि, सिद्धि, विघ्नहर्ता स्वरूप और करुणा का सुंदर वर्णन किया गया है। Ganesh Chalisa Hindi में गणपति बप्पा की आराधना और कृपा प्राप्त करने का अत्यंत प्रभावशाली साधन मानी जाती है। श्रद्धा और विश्वास के साथ श्री गणेश चालीसा का नियमित पाठ करने से जीवन के विघ्न, बाधाएँ, मानसिक तनाव और नकारात्मक परिस्थितियाँ दूर होती हैं।
विशेष रूप से बुधवार, गणेश चतुर्थी, संकष्टी चतुर्थी और किसी भी शुभ कार्य के प्रारंभ से पहले गणेश चालीसा का पाठ अत्यंत फलदायी माना गया है। भगवान गणेश की कृपा से साधक को बुद्धि, विवेक, सफलता, सुख-समृद्धि तथा आध्यात्मिक उन्नति की प्राप्ति होती है। गणपति बप्पा को प्रथम पूज्य देव माना गया है, इसलिए उनकी उपासना जीवन में शुभारंभ, स्थिरता और सफलता का मार्ग प्रशस्त करती है।
दोहा
जय गणपति सद्गुण सदन, कविवर बदन कृपाल। विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥
चौपाई
जय जय जय गणपति गणराजू। मंगल भरण करन शुभ काजू॥
जय गजवदन सदन सुखदाता। विश्व विनायक बुद्धि विधाता॥
वक्रतुंड शुचि शुंड सुहावन। तिलक त्रिपुंड भाल मन भावन॥