श्री पार्वती चालीसा माँ पार्वती की भक्ति, मातृत्व, करुणा, सौम्यता और शक्ति का अत्यंत पवित्र एवं प्रभावशाली स्तोत्र है। पार्वती चालीसा माँ आदिशक्ति के उस स्वरूप का गुणगान करती है जो प्रेम, धैर्य, तपस्या और अटूट समर्पण की प्रतीक हैं। यह चालीसा भक्तों को वैवाहिक सुख, परिवार में शांति, मानसिक संतुलन और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करती है।
श्रद्धा और विश्वास के साथ पार्वती चालीसा का नियमित पाठ करने से दांपत्य जीवन सुखमय होता है, मन को शांति मिलती है और सभी प्रकार की बाधाएँ दूर होती हैं। माँ पार्वती अपने भक्तों को संतान सुख, सौभाग्य, आरोग्य और अटूट पारिवारिक प्रेम का आशीर्वाद देती हैं। विशेष रूप से सोमवार, हरतालिका तीज, और नवरात्रि जैसे पावन अवसरों पर पार्वती चालीसा का पाठ करने से माँ गौरी की विशेष कृपा बनी रहती है और जीवन में सुख-समृद्धि का वास होता है।
दोहा
जय गिरिराज किशोरी, जय महेश मुख चंद। जय गौरी शंकर प्रिया, जय गणनायक मात॥
चौपाई
जय गिरिजा पति दीनदयाला। सदा करत संतन्ह प्रतिपाला॥
भाल चंद्रमा सोहत नीके। कानन कुंडल नागफनी के॥
अंग गौर शिर गंग बहाये। मुण्डमाल तन छार लगाये॥
वस्त्र खाल बाघंबर सोहे। छवि को देखि नाग मन मोहे॥
मैना मातु की हवे दुलारी। बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी। करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥
नंदी गणेश सोहैं तहँ कैसे। सागर मध्य कमल हैं जैसे॥
कार्तिक श्याम और गणराऊ। या छवि को कहि जात न काऊ॥
देवन जबहीं जाय पुकारा। तब ही दुख प्रभु आप निवारा॥
किया उपद्रव तारक भारी। देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥
तुरत षडानन आप पठायउ। लव निमेष महि मारि गिरायउ॥
आप जलंधर असुर संहारा। सुयश तुम्हार विदित संसारा॥
त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई। सबहि कृपा कर लीन्ह बचाई॥
किया तपहिं भागीरथ भारी। पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी॥
दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं। सेवक स्तुति करत सदाहीं॥
वेद नाम महिमा तव गाई। अकथ अनादि भेद नहि पाई॥
प्रगट उदधि मंथन में ज्वाला। जरत सुरासुर भए विहाला॥
कीन्ह दया तहँ करी सहाई। नीलकंठ तब नाम कहाई॥
पूजन रामचंद्र जब कीन्हा। जीत के लंक विभीषण दीन्हा॥
सहस कमल में हो रहे धारी। कीन्ह परीक्षा तबहि पुरारी॥
एक कमल प्रभु राखेउ जोई। कमल नयन पूजन चह सोई॥
कठिन भक्ति देखि प्रभु शंकर। भए प्रसन्न दिए इच्छित वर॥